गुरुवार, 5 अगस्त 2021

छोटी सी जिंदगी

                    भाग1:
आरती और सनाया दोनों सहेलियां बचपन से ही सगी बहनों की तरह रहती है,आरती के परिवार मे सिर्फ उसके पापा है,जो एक प्रतिष्ठित उद्योगपति है।उसके पापा ने उसे मां और पापा दोनों का प्यार दिया है ,आरती में उनकी जान बसती है।और सनाया के परिवार में उसके बड़े भैया और भाभी है। उसके भैया एक कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत है ।उनकी कोई संतान नही है ,वो सनाया को ही अपनी संतान समझते है।
दोनों ही सहेलियां एक ही यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई कर रही है,रोहित जो कि आरती का मंगेतर है,उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ता है।रोहित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का है,उसके माता पिता दिन रात एक करके अपने बेटे के सपनें पूरे करने में लगे रहते है।इसके बावजूद रोहित बहुत ही रंगीन मिजाज का लड़का है।

एक दिन आरती और सनाया यूनिवर्सिटी के केंटीन में बैठे बतिया रही थी कि अचानक उनकी नजर एक कोने में बैठे एक जोड़े पर पड़ी और वो सकते में आ गई ,आरती के तो होश ही उड़ गए,वो लड़का रोहित ही था जो किसी और लड़की के साथ बांहो में बाहें डाले बैठा था।कुछ क्षण वह उन दोनों की बेशर्मी को एक टक निराश मन से देखती रही।थोड़ा रुक कर वह रोहित के पास गई और उसे एक जोर का तमाचा जड़ दिया।साथ ही उससे अपने सारे रिश्ते तोड़ दिए।आरती आगे-आगे और रोहित उसके पीछे पीछे।रोहित-"आरती सुनो तो,तुमने जो भी कुछ देखा वो एक गलतफहमी है और कुछ नहीं"।आरती बिना कुछ सुने कार में बैठ घर को चल दी।
रात के खाने पर  उसके पापा को आरती के चेहरे पर सिर्फ उदासी ही दिखाई दे रही थी,उन्होंने नोटिस किया कि वह अपने पापा से नजरें चुरा रही है,उसके होंठ कुछ कहना चाह रहे है,पर जुबां साथ नही दे रही ।
"कोई बात हुई है बेटा, तुम ठीक तो हो।"आरती के पापा ने पूछा।
"नही पापा, कुछ नही।बस यूँही थोड़ी थकान हो रही है"आरती ने दबी सी आवाज में जवाब दिया।
"ठीक है खाना खा कर आराम करना बेटा"कहकर उसके पापा चुप हो गए,पर मन ही मन वो आरती को लेकर बहुत चिंता से घिर गए।
देर रात आरती के पापा का मोबाइल बजता है,उनके कॉल रिसीव करते ही आवाज आई"जी हेलो,अंकल मैं होस्टल से बोल रहा हूं।रोहित ने आत्महत्या करने की कोशिश की है।उसे सिटी हॉस्पिटल लेकर आये है,आप तुरंत आये यहां।"कहकर फोन कट जाता है।आरती और उसके पापा हॉस्पिटल जाते है।आरती मन ही मन बहुत अपराधबोध से भरी होती है,कांपते हुए रोहित के पास जाती है।रोहित के पास होते हुए भी वह खामोश ही रहती है यूनिवर्सिटी के दृश्य उसकी आंखों के सामने घूम रहे होते है।
कुछ देर की खोमोशी को तोड़ते हुए रोहित बोल पड़ता है-"तुम्हें अब भी मुझ पर यकीन नहीं आरती।वो सब छलावा था,और तुम सच"।
आरती -"तुम अभी आराम करो,इतना मत सोचो।छोड़ो ये सब,भूल जाओ सब कुछ।मैं तुमसे नाराज नही"।इतने में ही आरती के पापा आ जाते है "बेटा रोहित ,मैं आरती को घर छोड़ वापिस आता हूं तुम्हारे पास"।वो सारी बातों से अनजान थे। 
"आरती ,चले बेटा।"
"जी पापा"
रोहित को जाने का इशारा कर आरती अपने पापा के साथ वहाँ से चल देती है।उसके अंदर कश्मकश चल रही होती है ,दिल रोहित पर भरोसा करना चाहता है,तो दिमाग बिल्कुल नही।
अस्पताल से बाहर आते ही उसे  याद आता है कि वो अपना मोबाइल कमरे में ही भूल आई है।
"पापा ,मैं अपना मोबाइल तो अंदर ही भूल आई हूं।"
"कोई बात नही बेटा, फिर चल के ले आते है"।
वो दोनों वापिस अंदर जाते है।तभी रोहित और उसका दोस्त बातें कर रहे होते है"वाह यार क्या आइडिया दिया तूने आरती को फिर से यकीन दिलाने का।अब तो ऐश ही ऐश होंगे,एक तरफ घरवाली तो दूसरी तरफ बाहरवाली।"
आरती और उसके पापा ये सब सुनकर दंग रह जाते है,कोई इतना भी गिर सकता है भला।आरती के पापा के सामने अब सब कुछ साफ हो जाता है,वो अपनी बेटी की परेशानी की वजह समझ जाते है और उसे हाथ पकड कर वहाँ से ले जाते है।
"गाड़ी में बैठो बेटा"।
"जी पापा"नजरें झुकाए आरती बस इतना ही कह पाती है और गाड़ी में बैठ जाती है।वो बहुत शर्मिंदा रहती है,उसे याद आता है "कैसे उसने अपने पापा को दुखी करके रोहित  से रिश्ता जोड़ा था और उसके पापा ने अपनी बेटी की खुशी के सामने घुटने टेक दिए थे "।
आज वही बेटी अपने पिता से अपनी नजरें चुरा रही है।आंखों से आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे थे।बाप बेटी दोनों ही चुप रहते है।चारो ओर एक सन्नाटा सा पसरा हुआ होता है ,दोनों ही मन की उधेड़बुन में लगे होते है, तभी घर आ जाता है ।
"पापा,वो....."।
"बेटा अभी तुम आराम करो सुबह बात करते है"
इतनी बातचीत के बाद दोनों ही खामोशी से अपने अपने कमरे में चले जाते है।
जब रोहित और उसका वही दोस्त अगले दिन सुबह आरती के घर आते है तो देखते है कि वहां बहुत भीड़ जमा है,और एक खामोशी छाई हुई है,वही लोगों का एक समूह एक अर्थी को फूलों से सजा रहा होता है।आरती के पापा और सनाया खामोशी से उस अर्थी को देखे जा रहे है, उनकी आंखों से अश्रु की धारा मानो रुकने का नाम ही नही ले रही है।
जहाँ रोहित खड़ा होता है वही पास ही में दो लोग आपस मे बात कर रहे होते है कि"सुना है पंखे से लटककर जान दी है लड़की ने।जरूर दाल में कुछ काला है भाई"। यह सुनकर रोहित के रोंगटे खड़े हो जाते है,और मारे डर के वो अपने दोस्त को साथ ले वहाँ से भाग खड़ा होता है।

                  भाग2:
"जिंदगी भर तुम्हें बेइंतहा प्यार करने के बावजूद मैं तुम्हें दर्द सहना नही सीखा पाया बेटा।तुम्हारे इस तरह से जाने के बाद एक पल भी चैन से जी न सकूँगा मैं।मैं तुम्हारी यादो को इस शहर में अकेला छोड़ कर जा रहा हूं या यूं कहो कि इस भरी दुनिया मे तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया बेटा"आरती के पापा एक तस्वीर से बाते कर रहे है।अब उन्होंने बेसहारा लड़कियों को आसरा देने के लिए एक NGO बनाने का निर्णय ले लिया।

साहिल रोहित का रूममेट है,और उसका जिगरी दोस्त भी।रोहित ,साहिल की हरेक चीज हक से उपयोग भी करता है ।पर साहिल का चरित्र बिल्कुल श्वेत है और दिल एकदम सोने सा।उसके अलावा घर में परिवार के नाम पर उसकी मां और चाचा है।उसकी मां का नाम मुंबई के नामी उद्योगपतियों की गिनती में आता है। 
रोहित साहिल को आरती के बारे में सब कुछ बताता है रोहित-"यार वो आरती ...."
साहिल-"क्या ,आरती ने तुझसे सारे रिश्ते तोड़ लिए यही न। अच्छा ही हुआ ।और कितनी लड़कियों के साथ फ्लर्ट करोगे तुम,कब तक सबको धोखा दोगे।जिंदगी में कभी तो सीरियस हुआ करो मेरे भाई"।
रोहित-"वो बात नही है यार।"
"तो क्या बात है,अब कौन सा कांड कर दिया तुमने"साहिल ने हैरत से पूछा।
"आरती ने सुसाइड कर लिया है "रोहित ने साहिल को गले लगाते हुए जवाब दिया।
"क्या.....हाथ नही लगाना मुझे"साहिल ने रोहित को धक्का देते हुए कहा।
"ऐसे मत बोल यार ,मैं बहुत शर्मिंदा हूं"।
"तुझे अंदाजा भी है कि तूमने एक मासूम लड़की की जान ले ली है।दूर हो जाओ मेरी नजरों से"कहते हुए साहिल बैग निकाल समान पैक करने लगता है।
रोहित-"मैं जानता हूं कि मैं आरती का गुनाहगार हूं"।
साहिल-"तुम सिर्फ आरती के ही नही,तुम उसके पापा के भी गुनाहगार हो।तुमने एक ज़िल्लद भरी जिंदगी दे दी है"।
रोहित-"मुझे माफ़ कर दे यार"।
साहिल-"तुम मुझसे क्यों माफी मांग रहे हो।माफी मांगनी है भगवान से मांगो, आरती के पापा से मांगो"।
रोहित-"तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है,हमने पूरे चार साल साथ मे बिताये है,ऐसे मुझे छोड़कर मत जा।ज़िन्दगी बहुत बोझिल हो है यार,इन दो चार दिनों में ऐसा लग रहा है मानों कई सालों का दर्द झेल लिया हो मैंने"।
साहिल-"अभी तो शुरुआत है,तुम जैसे बदकिरदार और बेशर्म लड़के को मैं अपना दोस्त नही मानता।मेरी बददुआ है कि तुम्हें भी आरती की तरह ही दर्दनाक मौत मिले।तुम मौत मांगो और तुम्हें मौत नसीब ना हो"।कहकर साहिल हमेशा के लिए यूनिवर्सिटी छोड़ कर चला जाता है।
"चाचा मैं घर आ रहा हूं,मेरी पढ़ाई भी पूरी हो गई है ।अब आपका बिजनेस में साथ देना चाहता हूं"साहिल रोते हुए फोन पर बात करता है।
"हाँ बेटा, पर यूँ अचानक ये डिसीजन......?तुम तो आगे पढ़ाई जारी रखना चाहते थे।क्या हुआ साहिल सब ठीक तो है"चाचा ने पूछा।
"नही चाचा, वो मेरी एक अच्छी दोस्त की डेथ हो गई है"।साहिल ने जवाब दिया।
चाचा-"ओह ...!सॉरी बेटा"।
साहिल-"मैं घर आकर बात करता हूँ"।
चाचा-"ठीक है बेटा"।उनके फोन रखते ही साहिल की माँ वहाँ आ जाती है-"क्या हुआ भैया,क्या कह रहा था साहिल"।
"कुछ नही भाभी,बस उसकी एक दोस्त की डेथ हो गई है और अब वो वापिस घर आना चाहता है"।
"मेरा तो कलेजा कांप जाता है यह सुनकर भैया। जवान बच्चों की मौत उनके माँ बाप पर क्या कहर ढाती होगी...।मैं अभी साहिल को फोन करती हूं।"
"नही भाभी ,अभी नहीं।घर आये तो आराम से बात कीजियेगा।आप तो जानती है बहुत सेंसिटिव लड़का है"।
"जी भैया,आप सही कह रहे हो"।


                    भाग3:
साहिल अपने घर लौट अपना बिजनेस संभालने लगता है।गायत्रीदेवी(साहिल की मां)और साहिल साथ  में किसी प्रोजेक्ट पर डिस्कशन कर रहे होते है।साहिल बार बार अपनी नाक को टीशुपेपर से साफ कर रहा होता है।
गायत्रीदेवी-"मैं देख रही हूं बेटा, तुम जब से होस्टल से आये हो,ठीक नही रहते हो।मैं भैया से कहती हूं कि तुम्हें अभी डॉक्टर के पास ले जाए"।
साहिल हँसते हुए-"अभी....ऐसी कोई बात नही है माँ,वो बस थोड़ा फ्लू है,शायद कोई डस्ट एलर्जी है"।
गायत्रीदेवी-"अरे!टेम्पर भी तो रहता है"।
साहिल-"फ्लू में टेम्पर तो नॉर्मली रहता ही है न माँ"।
"नही नही ,ऐसे नही चलेगा भाई।भैया..."।कहते हुए गायत्रीदेवी अनुपमजी(साहिल के चाचा)को आवाज लगाती है।
शाम को घर लौटते वक्त अनुपमजी साहिल को फैमिली डॉक्टर के पास ले जाते है।डॉक्टर साहिल का चेकअप करते है:
"अनुपमजी ने बताया कि तुम्हें ये डस्ट इन्फेक्शन वाला जुकाम हरारत के साथ लगभग रहता ही है और पेट भी खराब रहता है"।
"हां, कुछ गलत खा लूं ,तो पेट खराब हो जाता है और फ्लू 10 -15दिनों में फिर से हो ही जाता है"।
"ये कब से हो रहा है"।
"करीबन पिछले एक साल से"।
डॉक्टर साहिल को लेटा कर चेकअप करते हुए -"जरा तेज सांस लो।हम्म... कुछ नही,बस साधारण सा जुकाम ही है,दवाई लिख देता हूँ , यदि कोई और परेशानी हो,तो वापिस आ जाना"।
दवाइयां खरीदकर चाचा और भतीजा दोनों ही घर लौट जाते है।
"क्या हुआ?क्या कहा डॉक्टर ने"गायत्रीदेवी पूछती है।
"कुछ नही,बस जुकाम ही है"अनुपमजी ने जवाब दिया।
सभी साथ में डिनर कर फिर प्रोजेक्ट पर बातचीत करने लगते है।
देखते ही देखते साहिल को बिजनेस संभालते हुए दो साल हो जाते है।इसी बीच उनकी कंपनी के एक महत्पूर्ण कर्मचारी का एक्सीडेंट हो जाता है जिस वजह से वो कर्मचारी कोमा में चला जाता है और कंपनी के एक प्रोजेक्ट का कामकाज रुक सा जाता है।
गायत्रीदेवी-"भैया मुझे लगता है हमे इस प्रोजेक्ट के लिए कोई दूसरा एम्प्लॉय रख लेना चाहिए"।
"नही माँ, ये प्रोजेक्ट मैं हेंडल करना चाहता हूँ"।साहिल ने कहा।
"ओके बेटा, पर तुम्हे भी एक सेकेट्री की जरूरत होगी"।गायत्रीदेवी ने जवाब दिया।
"तो तय हुआ कि सेकेट्री पद के लिए इंटरव्यू का आयोजन रखते है"अनुपम ने कहा।
"हाँ बिल्कुल"गायत्रीदेवी ने हामी भरते हुए कहा।
दस दिन बाद:
गायत्रीदेवी,अनुपमजी और साहिल तीनों ही एक कमरे बैठे इंटरव्यू ले रहे थे,पर कोई लड़की साहिल को समझ ही नही आ रही थी।तभी एक और आवाज आती है"मे आई कम इन सर"?
"सनाया तुम...."साहिल चौक कर खड़ा हो जाता है।
सनाया ने कई बार साहिल को रोहित के साथ देखा होता है तो उसके मन मे साहिल के लिए भी वही फीलिंग आ जाती जाती है,जो वो रोहित के लिए महसूस करती है और उसका मन नफरत से भर जाता है।परंतु मजबूरी के कारण उसे ये जॉब करनी ही होगी,इसीलिए वो साहिल के यस कहने पर अंदर आ जाती है।और भी उसके डॉक्यूमेंट देखकर उसे जॉब देकर इंटरव्यू का वही  समापन कर देता है और ये जॉब सनाया को देने की सिफारिश करने लगता है(क्योंकि वो सनाया को कॉलेज टाइम से ही पसंद करता था)।तीनों कुछ डिस्कशन के बाद सनाया को अपॉइंटलेटर देने का आर्डर देते है।अनुपम और गायत्रीदेवी दोनों एक साथ बोल पड़ते है"तुम इस लड़की को जानते पहले से जानते हो"?
"जी,मैंने बताया थाकि मेरी एक अच्छी दोस्त की डेथ हो गई है।सनाया उसी की दोस्त थी"।
"बस इतना ही"?अनुपम उसे थोड़ा चिढ़ाने लगता है।
साहिल शरमाते हुए अपने बालों में हाथ फेरने लगता है।
"ओह !तो बात यहाँ तक पहुँच गई और माँ को पता भी नही"।
"नही माँ मैं,वो ,बस बताने ही वाला था कि मैं उससे शादी करना चाहता हूं"।
"ह्म्म्म..."गायत्रीदेवी ने बैठे मन से कहा।

                 भाग4:
अगली सुबह जब साहिल नाश्ता करने नही आता है तो  उसके चाचा उसके कमरे मे जाते है।"क्या हुआ भाई आज बड़ी देर तक सोये हो"।
"फीवर हो गया है,वोमिट भी हो रही है।पूरी बॉडी में pain हो रहा है।फ्लू तो रहता ही है"साहिल ने जवाब दिया।
अनुपम-"चलो मेरे साथ ,अभी डॉक्टर के पास चलते है"।
साहिल और अनुपमजी दोनों डॉक्टर के पास जाते है।डॉक्टर चेकअप करते समय देखते हैकि गले के नीचे लाल धब्बा हैऔर आंखों में पीलापन।वजन भी तेजी घटा है।
डॉक्टर:"क्या तुम्हें माउथ इन्फेक्शन और थकान रहती है"?
साहिल:"जी"।
डॉक्टर:"मैंने कुछ टेस्ट लिखे है,बाहर लेब में करवा लें।रिपोर्ट देखकर ही प्रिस्क्रिप्शन दे पाऊंगा"।
सारे टेस्ट करवाकर दोनों घर लौटने को ही होते है कि वहाँ रोहित व्हीलचेयर पर दिखाई देता है,पर साहिल मुँह फेर लेता है और वहाँ से निकल जाते हैक्योंकि रिपोर्ट कल शाम को मिलनी है।
दूसरे दिन शाम को गायत्रीदेवी और अनुपमजी रिपोर्ट लेने जाते है।रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के पास जाते है।
डॉक्टर:"गायत्रीजी आपके बेटे को AIDS है"।
गायत्रीदेवी-"मेरे बेटे को AIDS कैसे हो सकता है ,मैंने बड़ी मेहनत से अपने बेटे की परवरिश की है"।
डॉक्टर:"यही सच है,मैं आपको डॉक्टर खेतान का एड्रेस देता हूं।वो AIDS विशेषज्ञ है,आप ये रिपोर्ट लेकर उनके पास चले जाए"।
गायत्रीदेवी,अनुपमजी के साथ डॉ. खेतान के पास जाते है"देखिए आपके बेटे का एड्स सेकंड स्टेज पर है,हमे तुरंत इलाज शुरू करना होगा।उसके शरीर पर जो धब्बे है वो धीरे धीरे ज़ख्म बनते जाएंगे।एक क्रीम दे रहा हूँ उन पर दीजियेगा और ये दवाइयां समय पर देनी होगी"डॉक्टर बताते है।
गायत्रीदेवी-"मेरा बेटा ठीक तो हो जाएगा न डॉक्टर।आप पैसों की बिल्कुल चिंता न करे,हम विदेश में भी इलाज करवाने को तैयार है"।
डॉक्टर-"देखिए ।इस बीमारी का कोई इलाज नही है,दवाइयों से आदमी की सांसें कुछ हद तक बढाई जा सकती है,पर बीमारी को जड़ से खत्म नही किया जा सकता है"।
गायत्रीदेवी-"बस डॉक्टर आपसे एक विनती है कि आप साहिल उसकी बीमारी न बताए प्लीज।मैं नही चाहती वो रोज मर मर जिये।

देर रात तक गायत्रीदेवी कुछ सोचती रहती है और अगले दिन सुबह वो अनुपम को किसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में एक हफ्ते के लिए ऑस्ट्रेलिया भेज देती है और  जल्दबाज़ी में सनाया और साहिल की शादी की डेट फिक्स करवा देती है।
"मां आप चाचा के वापिस आने का इंतजार तो करो,मैं अभी उनसे बात करता हूं, उन्होंने मुझे बधाई कॉल भी नही किया"।
"अरे नही,मेरी अभी ही उनसे बात हुई है,उन्होंने कहा है वो बहुत बिज़ी है और कोर्ट मैरिज ही तो है।रिसेप्शन उनके आने के बाद रख लेंगे।अब आगे मुझे कुछ नही सुनना"।
गायत्रीदेवी दो दिन बाद ही उन दोनों की शादी करवा देती है।

             भाग5:
"ये आपने क्या कर दिया भाभी।एक मासूम की जिंदगी को जानबूझकर मौत के मुँह में धकेल दिया"।अनुपम गायत्रीदेवी से अकेले में बात कर रहा होता है।
"इन सब बातों का अब कोई मतलब नही,क्योंकि उन दोनों को साथ रहते हुए तीन दिन हो चुके है।मैने जो किया सही किया,मैं अपने बेटे को खुशियां देना चाहती हूँ बस"गायत्रीदेवी ने रूखे स्वर में कहा।
"आप बहुत गलत कर रही है भाभी"।
"कल उनका रिसेप्शन है उसके बाद वो दोनों कुछ दिनों के लिए घूमने जा रहे है।आप मेरे दोनों बच्चों को खुश रहने दो"।
अनुपम यह सब सुनकर गुस्से में वहाँ से चला जाता है।
रिसेप्शन पर अनुपम को पता चलता है कि सनाया उनकी कंपनी के उसी एम्प्लॉय की बहन है,जिसका कुछ दिनों पहले एक्सीडेंट हुआ था।और गायत्रीदेवी उसकी भाभी को मासिक घर खर्च और पति के इलाज के पैसे भी देती है,ताकि वो लोग बिना किसी शक के अहसान तले दबे रहे और गायत्रीदेवी सबकी नजरों में महान बनी रहे।
अगले ही दिन साहिल और सनाया अपने ट्रिप पर निकल जाते है।और करीबन एक महीने बाद जब वो वापिस लौटते है तो सनाया को भी फ्लू हो चुका होता है और साथ ही वोमिटिंग भी होती है।अनुपम ये सब देखकर बहुत दुखी होता है।
साहिल-"मां ,मेरा फ्लू तो इसे भी लग गया,जरूर मुझ ही से इन्फेक्शन हुआ होगा इसे।मैं इसे डॉक्टर के पास ले जाता हूँ"।
"नही....नही...तुम नही मैं ले जाती हूं"।
गायत्रीदेवी सनाया को लेकर हॉस्पिटल जाती है।
डॉक्टर-"ये कौन है भाभीजी?"
"ये मेरी बहू है"गायत्रीदेवी ने हिचकिचाते हुए जवाब दिया।
"क्या हुआ है इन्हें.....फ्लू"डॉक्टर ने अंदाजा लगाते हुए पूछा।
"जी"गायत्रीदेवी।
डॉक्टर-"ये टेस्ट करवाओ बेटा और भाभीजी आप जरा यही रुकिए"।
"आप ये क्या कर रही है भाभीजी और आपने साहिल की शादी क्यों करवाई"सनाया के जाते ही डॉक्टर ने गायत्रीदेवी से पूछा।
"वो सब छोड़िये,आप प्लीज़ किसी को कुछ न बताए"।
"ओके ,पर आपने बहुत गलत किया है उस बच्ची के साथ"।
"मुझे जाना होगा,मैं सनाया को अकेले हॉस्पिटल में नही छोड़ सकती"।
गायत्रीदेवी सनाया के सारे टेस्ट करवा कर उसे घर ले जाती है।और अगले दिन खुद रिपोर्ट लेने जाती है,पर उसके आने से पहले ही सनाया सारी रिपोर्ट लेकर देख लेती है।"HIV positive......और प्रग्नेंसी पॉजिटिव।
ओह.... तो इसीलिए कल डॉक्टर मां से ......."।सनाया ने कल डॉक्टर और गायत्रीजी की सारी बाते सुन ली थी।
"बेटा ।तुम मेरी बेटी हो,मैं तुम्हारा इलाज करवाउंगी" गायत्रीदेवी पीछे से कहती है।
"मैं आपकी बेटी हूँ, इसीलिए आपने मुझे मौत के मुँह में धकेल दिया।समझ नही आ रहा है माँ ,मुझे माँ बनने की खुशी होनी चाहिए या......."सनाया ने रोते हुए कहा।
"वो सब मैं नही जानती,तुम बस साहिल को कुछ मत बताना"गायत्रीदेवी ने रूखे स्वर में कहा और हड़बड़ाती हुई वो घर को रवाना हो गई।
सनाया अपनी रिपोर्ट लेकर डॉक्टर के केबिन में जाती है।डॉक्टर उसे प्रिस्क्रिप्शन लिख कर देते है।
डॉक्टर-"ये दवाइयां टाइम पर लेना बेटा"।
सनाया-"क्या मेरा बच्चा भी HIV पॉजिटिव ही होगा"।
डॉक्टर-"100 में से एक केस में HIV पॉजिटिव मां का बेबी नार्मल होता है,पर एक आशा ही काफी होती है जीने के लिए।नेगेटिविटी से ही पॉजिटिविटी का जन्म होता है बस जरूरत है धैर्य और ढेर सारी कोशिश की।
अगर तुम अपना ख्याल रखो और पॉजिटिव रहो तो हो सकता है तुम एक स्वस्थ बेबी को जन्म दो"।
सनाया-"हम्म...."।
सनाया घर पहुँचे उससे पहले ही गायत्रीदेवी आकर साहिल को सनाया की रिपोर्ट के बारे में बता देती है और सनाया को एक चरित्रहीन लड़की साबित करने की कोशिश करती है।तभी वहां अनुपम पहुंच जाते है-"नही बिल्कुल नही साहिल,तुम्हारी माँ एक निर्दोष को दोषी बता रही है,असल में उसे ये बीमारी तुमसे मिली है"।
साहिल-"मुझसे?मुझे .....कब से....आप लोगो ने मुझे बताया क्यो नही?"
अनुपम-"हां तुम्हे पहले से ही ये बीमारी हैऔर तुम्हारी माँ ने सब कुछ जानते हुए पहले उस मासूम को मौत के मुँह में धकेल दिया और अब उसे ....."।
साहिल-"आपको ये नही करना चाहिए था मां"
"अच्छा और तुम्हें वो सब करना चाहिए था जिनकी सजा इस बीमारी के रूप में तुम्हे मिली।मैंने तुम्हें ये संस्कार दिए थे जो तुमने..... "गायत्रीदेवी ने कहा।
"भाभी,क्या कह रही है आप।इसमें साहिल की कोई गलती नही है,उसका चरित्र भी एकदम साफ है"अनुपम ऊँची आवाज में कहता है।
"तुम ये बात इतने यकीन से कैसे कह सकते हो?"
"क्योंकि हॉस्पिटल में हमें रोहित दिखा था,मैंने उससे पूछताछ की तब पता चला कि वो साहिल की गैरमौजूदगी में  साहिल रेज़र भी उपयोग कर लेता था,रोहित और भाभी डॉक्टर का भी कहना हैकि ये बीमारी किसी infected आदमी के उपयोग की हुई सुई,रेजर,टूथब्रश या हेयरब्रश इस्तेमाल करने से भी जो सकता है।मेरी रिक्वेस्ट पर डॉक्टर ने रोहित और साहिल दोनों का टेस्ट करवाया जिससे ये साबित हुआ कि साहिल को ये बीमारी रोहित से मिली है और मेरे पास प्रूफ भी है ।" अनुपम ने सारी बाते सबको बताई।
"क्या.....रोहित,वो हमारी बर्बादी का कारण है"सनाया ने घर के दरवाजे से हैरत भरी आवाज में कहा।
"हां बेटा, यही सच है ,ये देखो रिपोर्ट"अनुपम ने रिपोर्ट सनाया को देते हुए कहा।
"मैं जानती हूं तुम्हारे साथ बहुत गलत हुआ है,पर मेरे किये की सजा साहिल को ना देना बेटा और हो सके तो मुझे माफ़ कर देना"गायत्रीदेवी सनाया से कहती है।

तभी हॉस्पिटल से कॉल आता है"अनुपमजी रोहित अब इस दुनिया मे नही रहा।"
ये जानकर साहिल और सनाया को भी अपने सामने मौत खड़ी नजर आती है।

                 भाग6

"जो होना था गया बेटा।तुम दोनों के पास जितना भी समय है,मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों एक दूसरे का सहारा बनो,हिम्मत बनो"।अनुपम ने दोनों से उनकी परेशानी समझते हुए कहा।

"ये जानते हुए कि हम दोनों ही मरने वाले है,बस फर्क इतना ही हैकि मैं पहले मरूँगा और सनाया बाद में।पर मौत तो हम दोनों का ही मुकद्दर है"साहिल ने जवाब दिया।

"मौत तो सभी का मुकद्दर होती है बेटा, पर इस डर से क्या हमें मौत से पहले ही मर जाना चाहिए।आज जीवन है तो उस जीवन को खुशी से जियो,और भगवान को धन्यवाद दो कि उन्होंने तुम्हें पिता बनने का सौभाग्य दिया।सनाया के बारे मे सोचो-इस समय उसके लिए खुश रहना कितना जरूरी है"अनुपम ने साहिल को समझाते हुए कहा।

"चलो अब हम सब मन्दिर चल रहे है और वहाँ से भैया के घर हो कर आएंगे"सनाया ने झूठी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा।

साहिल-"तुमने भले ही माँ को माफ कर दिया हो सनाया,पर मैं उन्हें माफ नही कर पा रहा हूँ।अपने स्वार्थ के चलते इन्होंने तुम्हारी पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी और जाने अनजाने मुझसे इतना बड़ा पाप करवा दिया ,मैंने तुमसे तुम्हारी जिंदगी छीन ली और तो और तुम पर इल्जाम लगती रही....."।

सनाया-"अभी कहाँ साहिल।अभी तो हमे जीना है,एक दूसरे का और भी ज्यादा ख्याल रखना है।चलो भी अब अपना मूड ठीक भी करो और चलो हमारे साथ"।
साहिल सनाया को अजीबोगरीब अंदाज में देखने लगता है

"चलो भाई, अब ऐसे भी न देखो उसे और चलो"कहते हुए अनुपम सभी को मंदिर ले जाता है।

मन्दिर पहुँच कर सभी भगवान से प्रार्थना करते है और लौटते वक़्त देखते है कि एक बच्चे को लोग धक्के मार कर मन्दिर से बाहर निकाल रहे है और पत्थर मार रहे है।

"क्या हुआ भाई क्यों मार रहे हो बच्चे को।क्या किया है इसने"अनुपम ने बच्चे को बचाते हुए कहा।

"क्या किया है,अरे एड्स है इसे, एड्स और ऊपर से अनाथ भी।"एक आदमी ने कहा।

"पता भी है आपको ,कितनी गंदी बीमारी होती है ये एड्स,पता नही किसका गन्दा खून दौड़ रहा है इसकी रगों में।ऐसे लोगों को मन्दिर में कदम रखने का भी हक़ नही।अपवित्र कर दिया सारा मन्दिर"वही भीड़ में खड़े दूसरे आदमी ने कहा।

"अरे तो इसमें इस बेचारे बच्चे की क्या गलती है???"कहते हुए सनाया उस बच्चे को गले से लगाकर रोने लगती है उसे मन ही मन डर लगने लगता है कि कही उसकी संतान के साथ भी यही सब......।
यही सोच वह उस बच्चे से जुड़ाव महसूस करने लगती है और उसे अपने साथ घर ले जाने की जिद करने लगती है,साहिल और अनुपम उससे सहमत होते है और उसे भी अपने साथ ले आते है।जैसा कि तय हुआ था सभी लौटे वक़्त सनाया के भैया के घर जाते है,भैया की हालत अभी अभी सुधरने लगी थी तो उनके सामने अपना दर्द छुपाते हुए सनाया उनसे मिलती है।सभी साथ मिलकर खाना खाते है,और बतियाने लगते है

"क्या छुपा रही है सनाया,तुझे क्या लगता है तू अपने भैया से कुछ भी छुपा सकती है और चलो तू छुपा भी ले,तो क्या भैया को कुछ पता ही नही चलेगा।मुझे अनुपमजी ने सब कुछ बता पहले ही बता दिया है मेरी बच्ची...."सनाया के भैया बोले और बोलते बोलते खाँसने लगते है।

"अब कुछ न बोले भैया,बस आराम करें,आपको मेरी कसम...।मैं अभी आपके लिए पानी लेकर आती हूँ"कहकर सनाया पानी लेने किचन में चली जाती है।

"पता नही इतनी गन्दी बीमारी इन लोगो को कैसे हो गई। किसे पता इनकी बातों में कितना सच है कितना झूठ....।बाप रे बाप कही ये बीमारी इन दोनों से हमे न लग जाए।एक काम करती हूं इन दोनों के खाए हुए बर्तन अलग ही कर देती हूं।हां यही सही होगा...ह्म्म्म..."बड़बड़ाते हुए भाभी किचन समेटती है।तभी सनाया बाहर खड़ी ये सब सुन लेती है,उसकी आंखें भर जाती है।वो चुपचाप अंदर जाती है और पानी ले जाती है।

"अच्छा भैया!अब हम चलते है,फिर आयेंगे आपसे मिलने"उदास मन से सनाया कहती है।भैया-भाभी के बहुत रोकने पर भी वह सभी को घर वापिस ले आती है।

क्रमशः


भाग7:अंतिम भाग
 
रात भर सनाया करवटे बदलती रहती है।समझ नही आता उसे क्या करे।साहिल उसकी परेशानी पुर्णतः समझ रहा होता है,क्योंकि वो दोनों एक ही परेशानी से जूझ रहे है।

"सनाया,क्या हुआ नींद नही आ रही"।
"हाँ साहिल,मुझे अंदर ही अंदर ये बात खाये जा रही है कि कहीं हमारा बेबी भी हमारी तरह ही HIV पॉजिटिव हुआ तो....वो हमें कोसेगा कि हमनें क्यों उसे ये दर्दनाक जीवन दिया"।
"तो तुम क्या चाहती हो?"
"मेरे ख्याल से हमें इस बच्चे को abort कर देना चाहिए"।

"तुम जो भी फैसला लोगी, मैं हमेशा तुम्हे support ही करूँगा।पर मेरी जान अभी तुम ज्यादा मत सोचो,चलो अपनी आंखें बंद करो,जल्दी,चलो चलो..."।कहते हुए सनाया के बालों को बच्चों की तरह सहलाने लगता है।धीरे धीरे सनाया को नींद आने लगती है,पर साहिल रात भर सनाया की बातें ही सोचता रहता है,और आखिर एक निर्णय पर पहुंचता है।

सुबह वह सनाया के लिए bed tee लेकर आता है,साहिल के साथ चाय पीते हुए सनाया-"sorry, वो कल रात मे कुछ ज्यादा ही नेगेटिव हो गई थी,पता नही क्या बोल गई,मैं भूल गई थी कि जहाँ चाह होती है,वही पर राह भी होती है"।
"बिल्कुल ठीक कहा तुमनें, हमे उम्मीद नही छोड़नी चाहिए,और हाँ रहा सवाल हमारे बेबी की जिंदगी का,तो मुझे पूरा विश्वास है कि वो नॉर्मल बेबी की तरह होगा,हमारी तरह नहीं।और 1%मान भी लिया जाए कि वो भी हमारी तरह.....,"कहते हुए साहिल की आंखे भर आईं।आंसू भरी आंखों से फिर से बोलना शुरु करता है"और अगर ऐसा हुआ भी तो,हम उसके इस दुनिया मे आने से पहले ही उसे इज्ज़त भरी जिंदगी देने के लिए भरपूर कोशिश करेंगे"।


कुछ महीनों बाद:

देखते ही देखते नौ महीने पूरे हो जाते है।साहिल का पूरा मुँह छालो से भर जाता है इन्फेक्शन अब गले तक बढ़ जाता है।उसके शरीर के धब्बे अब जख्म में बदल चुके है,वजन तेजी से घट रहा है,थकावट बढ़ने लगी है।साथ ही अब सनाया के चेहरे पर भी धब्बे दिखाई देने लगे है,उसके मुँह में भी इन्फेक्शन हो गया है,पर वजन जरूर बढ़ गया है,दोनों ही हॉस्पिटल में भर्ती है।
सनाया को लेबरपेन शुरू होने लगे है.

डॉक्टर-"अब सनाया को ले जाना होगा".
साहिल-"अंकल ,मेरे बेबी को सनाया के बाद पहले मुझे ही दिखाया जाए plz."
डॉक्टर-"बिल्कुल ,तुम फिक्र मत करो,सब ठीक होगा"।
डॉक्टर सनाया को ले जाते है।

लगभग दो घंटे बाद सनाया एक स्वस्थ बेटे को जन्म देते ही दुनिया छोड़ कर चली जाती है और साहिल भी अपने बच्चे की सूरत देख सनाया के पास चला जाता है।

आठ साल बाद:

एक TVप्रोग्राम में गायत्रीदेवी इंटरव्यू दे रही होती है।जिसमें वो किसी NGO का जिक्र कर रही होती है,जो गांव गांव ,शहर शहर जाकर लोगो को एड्स के प्रति जागरूक करता है।HIV पॉजिटिव लोगो को मुफ्त इलाज मुहैया करवाता है,समाज को उन लोगो के साथ अच्छा व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है......।
ये NGO,सनाया और साहिल के बाद अब गायत्रीदेवी ही चला रही है। इंटरव्यू देकर जब बाहर आती है तो एक आवाज आती है"दादी!आप न TV पर बहुत beautiful लग रही थी"।
ये कहते हुए एक बच्चा दौड़ते हुए आकर उनके गले लग जाता है।गायत्रीदेवी और वो बच्चा एक दूसरे का हाथ थामे बाहर निकल जाते है।

💐🌷💐🌷💐💐🌷💐🌷💐💐🌷💐🌷💐


बस यही हमारी कहानी"छोटी सी ज़िन्दगी"का समापन होता है।plz मुझे बताइयेगा आपको कहानी कैसी लगी। 

















                      


















बुधवार, 23 अगस्त 2017

डाकिया

रोज देखती आते तुमको
सुबह सुबह निकल जाते
सांझ तले हो घर को जाते
डाकिया बाबू कहलाते तुम।

मैं भी तँकती राह तुम्हारी
कोई संदेश न लाते तुम
कागजी डाक देकर जाते
अरमान सारे तोड़ मेरे
वापिस लौट जाते  हो तुम।

दूर परदेस ब्याह कर आई
कोई अपना न दिखता यहाँ
राह तंकती आये कोई चिठियाँ
चिठियाँ अब न लाते तुम।

इस आधुनिक दुनिया ने
बदल डाले सारे दस्तूर
संदेश नही अब प्रीत भरा
अंखियां अश्रु दे जाते तुम।

स्वरचित प्रियंका शर्मा

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

प्रश्न

1)प्रश्न-
निरंतर-अ-प्रिय
हिंदी-111111-11
परन्तु यहाँ-122 12 होगा क्या कृपया समझाए?
2)प्रश्न-
कृतज्ञ-(हिंदी-112)
यहाँ 121 होगा क्या आदरणीय?
3)प्रश्न-
ज्ञानी-(ग्+या+नी//0 22)
सही है क्या?
4)प्रश्न-
कुछ अक्षरों में मात्रा गणना समझाए जैसे-त्र, क्ष,श्र।
5)प्रश्न-
सामान्यतः सामान 221 होता हैपरन्तु गायन मेजैसे

मेरा कुछ सामान (सामान उच्चारण सा आ मान हो रहा है तो क्या गणना 2221 होगी?या 221ही रहेगी?)
22 //2 //221या2221 ?
तुम्हारे पास पड़ा है
122//21//12//2
6)प्रश्न
नियम क्रमांक 7 के संदर्भ में।
सामान्यतः आधा अक्षर उससे ठीक पहले वाले की पीठ पर लद कर उससे जुड़ जाता है और पहले वाले अक्षर का मात्रा भार बदल जाता है परंतु इस नियम में ऐसा नही है  क्या ऐसा  इसलिये है क्योंकि आधा अक्षर के बाद दीर्घ अक्षर आया है या क्या ये नियम सिर्फ इन्ही शब्दों के लिए मान्य हैकृपया उलझन दूर करे।
मार्गदर्शन करें आदरणीय।

मित्रों, चंचल पाहुजा जी ने एक पंक्ति लिखी। उसकी मात्रा-गणना देखें--

बहुत अच्छा मिस्रा है आपका। कई बातें सीखने को मिलेंगी इससे। मिस्रा है--
"तेरे प्यार के गर सहारे न होते"
अगर सिर्फ़ शब्दों के हिसाब से देखें तो--
तेरे=22
प्यार=21
के=2
सहारे=122
न=1
होते=22
   मगर यह ग़ज़ल की एक बह्र यानी छन्द है--
फ़ऊलुन-फ़ऊलुन-फ़ऊलुन-फ़ऊलुन
हरेजै-हरेजै-हरेजै-हरेजै
122-122-122-122
अब आप अपनी पंक्ति पर आने से पूर्व तीन दिन पहले की एक चर्चा में मैंने "कोई" शब्द को लेकर कहा था कि "यह हवा भरा हुआ एक ऐसा गुब्बारा है, जो वैसे तो सामान्य अवस्था में रहता है मगर परिस्थितिवश अपना आकार भी बदल लेता है। ठीक यही बात "तेरे", "मेरे" जैसे शब्दों के साथ भी लागू होती है। आवश्यकतानुसार  "तेरे" के यूँ रूप बदलते हैं--
तेरे 22
तिरे=12
तेर=21
आप सब जानते हैं कि ग़ज़ल में मात्रा-पतन का सिद्धांत चलता है ( जिसका अध्ययन हम आगे चलकर करेंगे) उस नियम से "तेरे" शब्द उक्त तीन अवस्थाओं में समयानुसार खुद को ढाल लेता है। अब देखें आपकी पंक्ति में यह किस रूप में आया है--
तेरे प्यार के गर सहारे न होते
22 21  2  2  1 22 1 22
लेकिन यह चूँकि बह्र या छन्द नहीं है और अगर इस पंक्ति को इसी अवस्था में गाने या गुनगुनाने का प्रयास करेंगे तो शुरू में ही कुछ अटकाव महसूस होगा, क्योंकि इसकी बह्र है--
हरेजै-हरेजै-हरेजै-हरेजै
122-122-122-122
तिरे प्या/र के गर/सहारे/ न होते
तिरे प्यार के गर सहारे न
12   21  2  2  12 2 1
होते
  22

जी बिलकुल ठीक है। दरअस्ल इसमें पहले मुश्त+ए=मुश्ते होता है और फिर "ए" की मात्रा का पतन होता है। तब यह बह्र--
"मुश्त'-ख़ाक स' उठ जाए' मुकद्दर मेरा" र। जाता है। ध्यान दें कि जिस अक्षर पर ' चिह्न लगा है वहाँ मात्रा पतन हुआ है।

रविवार, 20 अगस्त 2017

लघुकथा संस्कृति

संस्कृति
               संस्कृति उदास थी| उसकी कोई पूछ नहीं थी| घर के कोने में पड़ी हुई थी| समय ने हाथ बढाया| आगे बढी, चल दी| सोचा, खुली हवा में घूम आऊँ| समय ने कहा कुछ गाओ, संगीत उसके रग रग में बसा था| बड़े आत्मविश्वास से मीरा का भजन सुनाना शुरू किया| समय ने प्यार से समझाया, संगीत ऐसा हो जो मन बहलाए, बाज़ार में धूम मचा दे, कुछ आर्थिक फायदा भी कराये| संस्कृति समझ गई, अब वह समय के साथ है व समय उसके साथ है |उसने गाने के साथ कमर मटकाई और यू पी, बिहार लूट ले गई| बाज़ार में समय की तूती बोलने लगी| हर तरफ उसकी चर्चा थी पर संस्कृति मन ही मन दुखी थी|
              कविता लिखने बैठी |सूर ,तुलसी प्रसाद उसकी आत्मा में बसे थे |समय ने विद्वत्ता झाड़ते हुए कहा क्या पुरानी सड़ी- गली कविता कर रही हो| बोलचाल की भाषा में सुनाओ| व्यंग्य करो, कटाक्ष करो| संस्कृति समय की बात समझ गई |मोहल्ले के कवि सम्मेलन जैसी द्विअर्थों वाली कविता कहने लगी | दिल ही दिल में रोने लगी| उसे लगा वह समय की गिरफ्त में आ गयी है |
             रंग व तूलिका मन में रचे बसे थे| समय को समझते हुए उसने अल्पना व रंगोली छोड़ , उलझाव वाले डिजाइन बनाए| श्लोक लिखा, बीच में ईश्वर का प्रतीक बनाया| समय ने घुर्राते हुए खारिज कर दिया| समय की आहट सुनाई दे, डिजाइन ऐसा होना चाहिए| संस्कृति ने गुस्से में ट्यूब से रंग बिखरा दिए, टाट के पैबंद लगाए| अव्यवस्था व अराजकता के प्रतीक वाले चित्र को प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ| समय खुशी से नाचने लगा| संस्कृति हैरान, चकित थी| उसे यह समझ में आ गया कि समय उसी के बल पर इठलाता है और उसे ही आंख दिखाता है| विजेता संस्कृति को कुछ बोलने के लिए कहा गया| अपनी मातृभाषा में उसने बोलना चाहा| समय ने फिर उसे घुड़का – अम्मां का पल्लू पकड़ कर कब तक रोती रहोगी, गवांर थी और गंवार ही रहोगी| गर्म हवा का थपेड़ा उसके मुंह पर लगा| अब उससे सहा नहीं गया| बस अब और नहीं |
           समय को पीछे छोड़ संस्कृति आगे निकल आई| उसे समझ में आ गया था अपने को ज़िंदा रखना है तो उसे किसी की दया की ज़रूरत नहीं है, बस अपनी अस्मिता को बनाए रखना है| समय खुद ब खुद उसके पास आयेगा|

बुधवार, 9 अगस्त 2017

#चरैवेति_चरैवेति      लघुकथा(प्रतीकात्मक शैली)   
                                                  
न जाने कब से लहराती-बलखाती, धारा बहती चली जा रही थी | जीवन के हर रंग उसने देखे थे, उन्हें अच्छी तरह से पहचाना था | अनगिनत उतार-चढाव उसने पार किये थे | हर मौसम के साथ उसे ताल-मेल बिठालना आ गया था | मस्त थी, खुश थी |

मगर अचानक बहते-बहते वह रो पड़ी, और बोली, “आखिर कब तक ऐसे बहती रहूँगी |” मन अवसाद से घिर आया | देखकर उसे, साथ बह रही सभी लहरें दुखी हो उठीं और पूछने लगीं, “तू तो इतनी मस्त-सी बहती है, अचानक तुझे हुआ क्या ?”

गला रुंध गया, काँपती आवाज में वह बोली, “बहुत थक गयी हूँ अब बहते-बहते | सर्र-सर्र बहती तीखी हवाओं के थपेड़े अब बर्दाश्त नहीं होते, तेज धूप की तपन जलाये देती है और चट्टानों से टकराकर नई दिशा की ओर बहना अब मेरे लिए बहुत मुश्किल हो गया है | मेरी ढलती उम्र भी अब मेरा साथ नहीं देती | आखिर कब तक यूँ ही बहती रहूँगी ?”

लहरों की आँखें नम हो आईं, वह उससे लिपट गयीं और प्यार करते हुए बोलीं, “तुझसे प्रेरित होकर तो हम सब तेरी राह पर चल पड़ी हैं | तू ऐसा सोचोगी तो हमारा क्या होगा ? हम हैं न तेरे साथ |”

वह चैतन्य हो उठी और आँसुओं को पोंछते हुए बोली, “न जाने क्यों यह क्षणिक विचार आ गया, पर मुझे तो बहते जाना है, जब तक सागर में जाकर न मिलूँ | कभी वाष्प बनकर, कभी बादलों में पानी की बूँद बन कर बरस जाना है | जीवन के अनन्त काल तक चलते जाना है |”

अब छोटी-बड़ी सभी लहरें उसे अपनी बाँहों में समेटे खिलखिलाती-लहराती-बलखाती गाते हुए बह चलीं, “चरैवेति-चरैवेति ... चरैवेति-चरैवेति |”

चाक पे मिट्टी

चाक कुम्हार मिट्टी आकार
देखो जाकर जब तुम साकार
मिट्टी छनी, कंकड़ हुए पार
पानी के संग घुलती हर बार
मारपीट को सहती गई
पैरों तले रौंदी गई

फिर भी
हर बार निखरती गई
हो जाती तैयार
ढलने को
किसी भी
साँचे में
क्या सही क्या गलत
सब भुलाकर
कर दिया समर्पित खुद को
तन मन अपना गलाकर

अब बारी आपकी है
जो चाहे बना ले
चाक को घुमाकर
मिट्टी को सहलाकर
मन चाहे साँचे में ढाल दे
जो करो थोड़ी सख्ती
आकृति बिगड़ जाती
टूट टूट कर फिर जुड़ जाती
मिट्टी सब कुछ सह जाती
मिट्टी सब कुछ सह जाती।
#स्वरचित

मंगलवार, 8 अगस्त 2017


2122     2122    212
दरमियाँ दूरी मिटाकर देखिये।
फूल गुलशन में खिलाकर देखिये।

है 2म1हक2ती 2धू2प 1भी 2तो2सांझ2 त1ले2
हम2स1फर2 मुझ2को2 ब1ना2 कर2 देखिये212

आरजू212 पूरी22 हमारी122 भी2 होगी22(एक मात्रा  अंत में बढ़ाई जा सकती है)
आसमां 212 पैरों22झुका12 कर2 देखिये212

जो 2रूठे12 दिलबर22 मिरे12 है2 सनम12
अब 2जरा 12उनको 22मनाकर 122देखिये212।

दर्द21 दिल2 के2 भूल21सारे22 हम2न1वां2
इश्क़ मेंअब गुनगुनाकर देखिये।
सादर नमन
कमियां सादर आमन्त्रित है(सुधार हेतु)
आज का मिसरा
इश्क़ में अब गुनगुनाकर देखिये
बह्र-2122  2122  212

2122     2122    212
दरमियाँ दूरी मिटाकर देखिये।
फूल गुलशन में खिलाकर देखिये।

है महकती धूप भी तो सांझ तले
हमसफ़र मुझको बनाकर देखिये।

आरजू पूरी तुम्हारी कब हुई
आसमां पैरों झुकाकर देखिये।

जो रहे नाराज़ मेरे है सनम
अब ज़रा उनको मनाकर देखिये।

दर्द दिल के भूल सारे हमनवां
इश्क़ में अब गुनगुनाकर देखिये।