रविवार, 30 जुलाई 2017

लघुकथा दायित्व

प्रतियोगिता हेतु लघुकथा(दायित्व)

शर्माजी ,वकील साहब के हरे भरे बगीचे में घूम रहे थे।घूमते हुए कई पौधो पर गौर किया,जो जर जर हालत में थे।बगीचे मे अमरूद,अनार,केला,आंवला,सीताफल,कटहलआदि कई फल तथा कई पुष्प पौधे थे।परन्तु न किसी पौधे मे फूल आये और न ही फल।बगीचे की हालत ऐसी मानो हरियाली बढ़ाने हेतु ढेर सारे पौधे ढूंस ढूंस कर भर दिए हो।
"देखो साहब!सादर...कहना ही चाहूँगा कि हमारा दायित्व है कि हम चाहे वर्ष में एक या दो पौधे लगाये,परंतु उनका अपनी संतान की भांति लालन करे।और उन्हें पौधे से वृक्ष के रूप में बढ़ने दे ताकि वह फल-फूल सके।तभी वृक्षारोपण सार्थक माना जायेगा।"
"अरे शर्माजी !जहां देखो वहां प्रदूषण।सांस लेना भी दुश्वार हो रहा है ।तो अच्छा ही है ज्यादा पौधे ज्यादा हरियाली।"
"पहली बात तो इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता में कमी आ जाती है परिणामस्वरूप कोई पौधा फल फूल नही पाता।"
"और ?"
"और ये कि सोचिये यदि एक छोटे से कमरे में ढेर सारी भीड़ को ढूंस ढूंस कर भर दिया जाये तो क्या सांस लेना दुश्वार नही हो जायेगा उनका।"

#स्वरचित
प्रियंका शर्मा

शनिवार, 29 जुलाई 2017

सोपान

पांच अप्रकाशित रचनाएँ

1)पहली रचना-

#विषय-चाँद#

#विधा-हायकू#

चाँद न आया
दूर तलक अब
अँधेरा छाया।

रात घनेरा
घन घन गहरा
तारों का डेरा।

मन बावरा
पिया पर ठहरा
लाज लपेरा।

चाँद चकोर
बिरहन की आली
मैं मतवारी।

तारे बैरन
आज पि मिलन की
लगती काली।

क्यों मनवा
अब झांके उधर
शाख जिधर।

साँझ सकारे
दिल यही पुकारे
बालम आ रे।

हम अरसे
मिलन को तरसे
मन भाग रे।

मनवा छोड़
आज पि की नगरी
छोड़ डगरी।

चाँद निकला
हटा सब पहरा
मुख ठहरा।

आँसू गिरते
पियाजी जो दिखते
प्यार गहरा।

स्वरचित

प्रियंका शर्मा।

2)दूसरी रचना-

विषय-मगरूर
विधा-छंद मुक्त रचना।

होकर मगरूर,नशे में चूर,
मत भूलो तुम मानवता को,
जन्म लिया मनु वंशज हो,
मत धारो तुम दानवता को।

मशहूर से मगरूर का देखो,
नाता बहुत करीब है होता,
मशहूर तो हो,मगरूर न होना,
त्यागो तुम इस जटिलता को।।

हाथों में लेकर हम हाथ चलो,
सहज स्वीकार करो सरलता को,
नित स्नेह सदा निःस्वार्थ बनो,
गढों अहम से परे मिसाल अहो।
#स्वरचित#

प्रियंका शर्मा

3)तीसरी रचना-
विधा-दोहा

विषय-सावन।

1)अद्भूत ठण्डी फुहारे,सावन लेकर आय।

   तीज त्यौहार मनावे,मनवा हिलौरे खाय।।

2)रिमझिम बारिश भये,मनभावन संगीत।

    आतुर मनवा पी मिलन,पीर बड़ी मनमीत।।

3)सावन महिना अति प्रिये,शिवजी पूजन होत।

    झिलमिल निश्छल जले,अनंत भोला जोत।।

4)बगीया सावन झूले,हरनार एक हि आस।

    सावन पी संग फुले,जनम जनम हरि दास।।

5)सावन पूनम मनावे,रक्षाबंधन तिवार।

    भाई बहना जतावे,एकदूजे प्रति हि प्यार।। 

#स्वरचित

प्रियंका शर्मा।

4)चौथी रचना-
विधा-गज़ल

बह् -212  212  212  212

प्यार तूने जताया मजा आ गया।

खण्डहर मे ख्वाब सजाया मज़ा आ गया।

कांटो पे हुआ ना मुमकिन चलना

चुनकर कांटो को जलाया मज़ा आ गया।

आँख मे थी हया हर मुलाकात पर

हाथ तूने बढ़ाया मज़ा आ गया।

तूने शरमा के मेरे  सवालात पे

सर जो अपना झुकाया मज़ा आ गया।

अश्क़ को आँख ही आँख में पी लिया

ग़म जहाँ से छुपाया मज़ा आ गया।

अजनबी होता सजा भी देता 'प्रिया'

तूने जो  यूँ सताया मज़ा आ गया।

#स्वरचित 

प्रियंका शर्मा।

5)पांचवी रचना-

विधा-लघुकथा।

 लघुकथा(प्रकृति)

सुनिधि बड़ी उदास बैठी थी।आज उसकी शादी है और वो रोहित को चाहती है,रह रहकर रोहित की याद सताये जा रही थी।आँसू थे कि रुकने का नाम ही नही ले रहे थे।तभी उसकी सहेली लीला वहां आ गई।

"क्या मुँह बनाये बैठी है भूल जा अब सब कुछ और आगे बढ़।वर्तमान को स्वीकार कर।शादी है आज तेरी।चल उठ!कही घूम आते है।"

लीला,सुनिधि का हाथ पकड़ उसे खींच कर ले जाने लगी।

"काकी हम अभी आ जाएंगे।"

"अच्छा ठीक है बेटा। मन बहल जायेगा इसका वरना कभी से रो रही है।तू  ही समझा इसे।इसके बापू जिंदा होते तो बात कुछ और होती पर मैं अकेली जान समाज को क्या मुँह दिखाउंगी।जात बिरादरी में रहना मुश्किल हो जायेगा वरना मैं कोई इसके प्यार की दुश्मन थोड़े ही हूँ।"

"हां काकी,सब समझती हूँआप चिंता मत करो।हमारी सुनिधि बहुत समझदार है।"

लीना सुनिधि को नदी किनारे ले जाती है।कुछ देर दोनों खामोश बैठे रहते है।सुनिधि को उदास देख लीना उस पर पानी उड़ा देती है।जैसे ही पानी की बौछार सुनिधि के चेहरे को भिगोती है उसका मन थोड़ा ठीक होने लगा।चारों और हरियाली हरे भरे पेड़ पौधे,फूलों की सौंधी सौंधी खुशबू उसके मन को आनंदित करने लगी। रिमझिम सावन की फुहारें मानो उसकी सारी पीड़ा हरने लगी।पास ही स्थित मंदिर के हाल में बैठकर दोनो ने अपनी माँ का भेजा खाना उसे खिलाया।

" सुनिधि याद है पिछली बार जब यहाँ हम आये थे , बाढ़ ने यहाँ की हरियाली को रेगिस्तान मे तब्दील कर दिया था । और आज ये हरियाली मानो कभी कुछ हुआ ही ना हो ।

यही दस्तूर है यार , अतीत को इतना भी वक्त नहीं देना चाहिये कि भविष्य बदरंग हो जाये । आगे बढ़ना ही जीवन है....."

"तू  और माँ ठीक ही कहते हो,उसे भूल जाने में ही भलाई है।

जाने कहाँ चला गया मुझे छोड़कर,अब कब तक माँ इंतजार करे।उसकी भी जिम्मेदारी है पता नही वो आएगा भी या नही।"

" अब ज्यादा सोच मत और इस खुशी को यूँ ही बरकरार रख।चल अब घर चले काकी इंतजार कर रही होगी,दुल्हनियां।"

दोनों बाहों में बाहे डाले जोर जोर से हँसने लगी।

स्वरचित

प्रियंका शर्मा।

जीवन-परिचय प्रारूप:

1 रचनाकार का नाम- प्रियंका शर्मा.   

पिता का नाम-श्री वासुदेव उपाध्याय

माता का नाम-श्रीमती कौशल्या उपाध्याय
2)पति का नाम- ऋषि शर्मा
3)वर्तमान/स्थायी पता-(प्रकाशन सामग्री भेजने का पता)
   प्रियंका शर्मा व/०ऋषि शर्मा
    गवली हॉस्पिटल के पास,
     कुरावर मंडी,जिला-राजगढ़(ब्यावरा)
     तहसील-नरसिंहगढ़(म.प्र.)
4)
    ई मेल-
     Priyankaupadhyay193@gmail.com
5)शिक्षा- बी.एस. सी.(कंप्यूटर साइंस)
              एम. एस. सी.(कंप्यूटर साइंस)
              (पी. जी. कॉलेज,मन्दसौर,
                 विक्रम यूनिवर्सिटी,उज्जैन)
    जन्म-तिथि-
            15/05/1987

जन्म स्थान-गंधवानी,जिला-धार(म.प्र.)
6)व्यवसाय- Nill          

7)प्रकाशन विवरण-
            प्रयास पत्रिका(संपादक-सरन घई) दो कहानी ,हिंदीसागर पत्रिका(जे. एम.डी. पब्लिकेशन,दिल्ली), विश्वगाथा (चार लघुकथाऐ), सत्य की मशाल पत्रिका में प्रकाशित होने वाली एक चित्रआधारीत प्रतियोगिता में विजेता लघुकथा।
8)घोषणा-
            मैं ये घोषणा करती हूँ कि पत्रिका "* हिंदीसागर " द्वारा भेजी गयी समस्त रचनाएं मेरे द्वारा लिखित है तथा जीवन परिचय में दी गयी समस्त जानकारी पूर्णतया सत्य है,असत्य पाये जाने की दशा में हम स्वयं जिम्मेदार होंगे।
      
प्रियंका शर्मा
दिनांक- 02/08/2017



सोपान सांझा संग्रह

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

पांच अप्रकाशित रचनाएँ

1)पहली रचना-

#विषय-चाँद#

#विधा-हायकू#

चाँद न आया
दूर तलक अब
अँधेरा छाया।

रात घनेरा
घन घन गहरा
तारों का डेरा।

मन बावरा
पिया पर ठहरा
लाज लपेरा।

चाँद चकोर
बिरहन की आली
मैं मतवारी।

तारे बैरन
आज पि मिलन की
लगती काली।

क्यों मनवा
अब झांके उधर
शाख जिधर।

साँझ सकारे
दिल यही पुकारे
बालम आ रे।

हम अरसे
मिलन को तरसे
मन भाग रे।

मनवा छोड़
आज पि की नगरी
छोड़ डगरी।

चाँद निकला
हटा सब पहरा
मुख ठहरा।

आँसू गिरते
पियाजी जो दिखते
प्यार गहरा।

स्वरचित

प्रियंका शर्मा।

2)दूसरी रचना-

विषय-मगरूर
विधा-छंद मुक्त रचना।

होकर मगरूर,नशे में चूर,
मत भूलो तुम मानवता को,
जन्म लिया मनु वंशज हो,
मत धारो तुम दानवता को।

मशहूर से मगरूर का देखो,
नाता बहुत करीब है होता,
मशहूर तो हो,मगरूर न होना,
त्यागो तुम इस जटिलता को।।

हाथों में लेकर हम हाथ चलो,
सहज स्वीकार करो सरलता को,
नित स्नेह सदा निःस्वार्थ बनो,
गढों अहम से परे मिसाल अहो।
#स्वरचित#

प्रियंका शर्मा

3)तीसरी रचना-
विधा-दोहा

विषय-सावन।

1)अद्भूत ठण्डी फुहारे,सावन लेकर आय।

   तीज त्यौहार मनावे,मनवा हिलौरे खाय।।

2)रिमझिम बारिश भये,मनभावन संगीत।

    आतुर मनवा पी मिलन,पीर बड़ी मनमीत।।

3)सावन महिना अति प्रिये,शिवजी पूजन होत।

    झिलमिल निश्छल जले,अनंत भोला जोत।।

4)बगीया सावन झूले,हरनार एक हि आस।

    सावन पी संग फुले,जनम जनम हरि दास।।

5)सावन पूनम मनावे,रक्षाबंधन तिवार।

    भाई बहना जतावे,एकदूजे प्रति हि प्यार।। 

#स्वरचित

प्रियंका शर्मा।

4)चौथी रचना-
विधा-अतुकांत

सीप चंद सी परछाई,
देखी मैंने जल नभ में,
नाविक बन हुई सवार ,
नीले अम्बर के जल तल में।

नीला अम्बर अति सुंदर शोभित,
फैल रहा है चंद चंद में,
शशिकला भी सुन्दर सुशोभित,
झलकी मेरे तन मन मे।

मिलन ये कैसा सुन्दर देखो,
जल नभ का क्षितिज में,
और मेरा मन हुआ लालायित,
छूने को इस मधुर भ्रम में।

देखू जैसे चकोर टकटकी,
ओझल न हो घडी सुनहरी,
मन हर्षित हुआ प्रफुल्लित,
बयां न होगी मेरे मन की।

#स्वरचित#
प्रियंका शर्मा।

5)पांचवी रचना-

विधा-छंद मुक्त।

आदमी भूल करता है,
नाकामयाब भी होता है,
और दुःख भी है पाता,
लेकिन कभी बैठा नही रहता।
पुण्य-सलिला धारा नदी की,
बढ़ती हुई ही निर्मल है रहती ,
टूटती कगार मित्रों कभी ,
दे  जाती है नुकसान भी,
इस डर से धारा को जो,
बांध दिया सदा के लिये,
होगा बुलावा सीधा ये तो,
सड़ान्ध और मृत्यु का।
ईश्वर भी सृष्टि को अपनी,
नही बाँधते सांकल से,
नई नई तब्दीलियां कर,
रखते चौकन्ना सृष्टि को,
तू भी उठ!!और लाँघ समाज की सीमा को,
गूंथ साहस के धागों में,
जीवन के हर एक कार्य को।

स्वरचित 

प्रियंका शर्मा

जीवन-परिचय प्रारूप:

1 रचनाकार का नाम- प्रियंका शर्मा.   

पिता का नाम-श्री वासुदेव उपाध्याय

माता का नाम-श्रीमती कौशल्या उपाध्याय
2)पति का नाम- ऋषि शर्मा
3)वर्तमान/स्थायी पता-(प्रकाशन सामग्री भेजने का पता)
   प्रियंका शर्मा व/०ऋषि शर्मा
    गवली हॉस्पिटल के पास,
     कुरावर मंडी,जिला-राजगढ़(ब्यावरा)
     तहसील-नरसिंहगढ़(म.प्र.)
4)
    ई मेल-
     Priyankaupadhyay193@gmail.com
5)शिक्षा- बी.एस. सी.(कंप्यूटर साइंस)
              एम. एस. सी.(कंप्यूटर साइंस)
              (पी. जी. कॉलेज,मन्दसौर,
                 विक्रम यूनिवर्सिटी,उज्जैन)
    जन्म-तिथि-
            15/05/1987

जन्म स्थान-गंधवानी,जिला-धार(म.प्र.)
6)व्यवसाय- Nill          

7)प्रकाशन विवरण-
            प्रयास पत्रिका(संपादक-सरन घई),हिंदीसागर पत्रिका(जे. एम.डी. पब्लिकेशन,दिल्ली)।
8)घोषणा-
            मैं ये घोषणा करती हूँ कि पुस्तक *"सोपान सांझा संग्रह"* भेजी गयी समस्त रचनाएं मेरे द्वारा लिखित है तथा जीवन परिचय में दी गयी समस्त जानकारी पूर्णतया सत्य है,असत्य पाये जाने की दशा में हम स्वयं जिम्मेदार होंगे।
      
प्रियंका शर्मा
दिनांक- 30/07/2017

प्रमाणपत्र-




गुरुवार, 27 जुलाई 2017

बह् 2122    2122
काफ़िया-आ
रदीफ़-रहा।

चाहे सदा खारा रहा
तू ही सदा प्यारा रहा।

वादे सदा तोड़ा किये
सब कुछ यहाँ धोखा रहा।

यादे बसी तेरी सनम
ख्वाबों गमें सजाता रहा।

राहों सजा के फूल वो         
रौशन सदा महका रहा।

उजड़ा हुआ घर-द्वार था,
सामान सब बिखरा रहा।

महँगे टमाटर हो गये
आलू सदा सस्ता रहा।

टेढ़े ज़रा रस्ते रहे
औ मैं सदा सीधा रहा।

अश्कों मिरे जो देख कर
सारा जहां हँसता रहा।

बुधवार, 26 जुलाई 2017

गगरी

कुण्डलियाँ

   गगरी भरी पानी से,सिर पर उसे उठाय
    गौरी सखियों के संग ,पनिया भरने आय
   पनिया भरने आय,और मन मे शरमावै
   लाज शरम की खातिर,घूँघट मुँह में दबावै
   "प्रिया"खड़ी खड़ी देखत,पनघट रमणीय अति
   पर फिसलन भी है बड़ी,छलकत जाय गगरी।

#स्वरचित
प्रियंका शर्मा

   
  

शनिवार, 22 जुलाई 2017

दिनकर

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध

-- रामधारी सिंह दिनकर