शनिवार, 3 जून 2017

किसान/जापानी विधा सदोका

किसान हल
   करे जब पहल
     भरे तब महल
        बोता है बीज
           पाता न कोई चीज
             बनता है नाचीज।

बंजर धरा
  बोले सुन तो ज़रा
    मैं तेरी वसुंधरा
      किसान भला
         तू नही है अबला
           हक छीने दे सजा।

तू मजबूर
     तेरा क्या है कसूर
       जमीदार नासूर
         डाले वो दाने
            तू ही ना पहचाने
                जो उसके बहाने।

पकी फसल
   करती है पागल
     चोट करे घायल
       छद्य परुष
         समझते जुगाड़
            करते खिलवाड़।

दिखाते रौब
  ओहदा आसमान
     मन रहे गुमान
       फेंकते दाना
          फंसाते प्रलोभन
            करते सम्मोहन।

भोगे किसान
   जीता संग खुद्दारी
      जीत जाती गद्दारी
         बेपरवाह
            करता है गुनाह
              कौन करे आगाह।

तेरी लाचारी
    उनकी हथियारी
      करे तू हड़ताल
         ये राजनीति
            सब इसकी बिसाद
               फंसाद ही फंसाद।

समझदारी
   औ रख होशयारी
     काहे की मारामारी
         खेत किसान
            तू ही पहलवान
              बन जा बलवान।
    
#स्वरचित#प्रियंका शर्मा
जीवन-परिचय प्रारूप:

1 रचनाकार का नाम- प्रियंका शर्मा.   
2)पति का नाम- ऋषि शर्मा
3)वर्तमान/स्थायी पता-
   प्रियंका शर्मा व/०ऋषि शर्मा
    गवली हॉस्पिटल के पास,
     कुरावर मंडी,जिला-राजगढ़(ब्यावरा)
     तहसील-नरसिंहगढ़(म.प्र.)
4)फोन नंबर/व्हाट्स एप्प नंबर-
    8463827141
    ई मेल-
     Priyankaupadhyay193@gmail.com
5)शिक्षा- बी.एस. सी.(कंप्यूटर साइंस)
              एम. एस. सी.(कंप्यूटर साइंस)
              (पी. जी. कॉलेज,मन्दसौर,
                 विक्रम यूनिवर्सिटी,उज्जैन)
    जन्म-तिथि-
            15/05/1987
6)व्यवसाय- Nill          

7)प्रकाशन विवरण-
            प्रयास पत्रिका(संपादक-सरन घई),हिंदीसागर पत्रिका(जे. एम.डी. पब्लिकेशन,दिल्ली)।
8)घोषणा-
            मैं ये घोषणा करती हूँ किप्रकाशन हेतु भेजी गयी  रचना मेरे द्वारा लिखित है तथा जीवन परिचय में दी गयी समस्त जानकारी पूर्णतया सत्य है,असत्य पाये जाने की दशा में हम स्वयं जिम्मेदार होंगे।
      
प्रियंका शर्मा
दिनांक- 
04/06/2017


          
     
      
        
  

            

        
    
   
  

       
  
   
     
 

जापानी विधा तांका

**जापानी काव्य शैली-ताँका**
*संरचना- 5+7+5+7+7= 31 वर्ण
*दो कवियों के सहयोग से काव्य सृजन
*पहला कवि-5+7+5 = 17 भाग की रचना , *दूसरा कवि 7+7 की पूर्ति के साथ श्रृंखला को पूरी करता है |
*पूर्ववर्ती 7+7 को आधार बनाकर अगली श्रृंखला 5+7+5 यह क्रम चलता रहता है इसके आधार पर अगली श्रृंखला 7+7 की रचना होती है | इस काव्य श्रृंखला को रेंगा कहते थे |
5+7+5+7+7= 31 वर्ण

******कविता******

ईश्वर की कृपा जीव लोक तक

* प्रभु भजन
प्राकृतिक सौंदर्य
उत्साही मन
नई ऊषा किरण
नव प्रभात संग
नई उमंग
नव चेतना लिए
धरा प्रसन्न
हर्षित जन-जन
उल्लासित है मन
विहग करें
सुरीला कलरव
मन मयूर
तन डोले बे-ताल
सुहावनी प्रभात
अरूण संग
स्वर्णिम गगन
मलय बहे
सुगंधित भू-तल
जीवलोक प्रसन्न |

प्रकृति /हायकू

प्रकृति संग
      प्रफुल्लित है मन
          शांति औ हम।
सदुपयोग
     बने फिर सुयोग
          मिटे वियोग।
काटे जो वृक्ष
      जीवन बने तक्ष
         सोचो हो दक्ष।
नदी पहाड़
     बोले सब दहाड़
       सुनो तिहाड़।
बचाओ पानी
      बूंद ही जिंदगानी
        रचो कहानी।
पक्षी गगन
   मेघ हुए मगन
      सुनो लगन।
मरीज रुके
   जब प्रकृति तले
       हर रोग टले।
करो प्रयास
      नही रचो विनाश
            बदहवास।
#स्वरचित

    
      

         
        
    
   
      
         
    

दोस्त

हो तकलीफ जो कोई तो मुझको बताना,हूँ साथ मैं तेरे हर पल तुम भूल न जाना, पर आज भी कुछ कहने को सुनने को ये मौके ढूंढ रही है,भीतर से पत्नी तुम में एक दोस्त ढूंढ रही है। मैं मुश्किल नहीं इतनी के समझ ना आऊँ,पर ना जाने किन अल्फ़ाज़ों में तुम्हे समझाऊं, डर है मुझे मेरे हाथों से प्रेम की ये डोर छूट रही है,भीतर से पत्नी तुम में एक दोस्त ढूंढ रही है। सभी पति और पत्नी ज़िम्मेदारी है निभाते,पर इस बीच वो खुद को हैं कहीं खो आते, मैं देख सकती हूँ के बालों की सफेदी के मुकाम पे ये कमी तुम्हे भी खल रही है,भीतर से पत्नी तुम में एक दोस्त ढूंढ रही है। क्यूँ गुम हो तुम खुद में मैं भी तो यहाँ हूँ,तुमसे जुडी इस रिश्ते के दरमियान हूँ, दूरी बढ़ते बढ़ते अब बातें भी खामोश हो रही हैं,भीतर से पत्नी तुम में एक दोस्त ढूंढ रही है। मन के दरवाज़ों को पाट के तो देखो,तुम मुझसे अपने आप को बाँट के तो देखो, एक नज़र उठा के देख लो ये हज़ार कोशिशें कर रही है,भीतर से पत्नी तुम में एक दोस्त ढूंढ रही है। काश हम एक दूजे से बिल्कुल खुले हों,हम दूर हो भले ही पर मनमें ना फासले हों, झिझक ये मिट जाए तुमसे पहल करने को कह रही है,भीतर से पत्नी तुम में एक दोस्त ढूंढ रही है।

बाग गुफाएं

हैं छोटी सी ,मगर मोटी सी
एक कहानी, इकलौती सी
बाग गुफाएं, कहती सदाए
वो आदि इमारतें,
वो चित्रकारी,
वो उम्दा नक्कारी,
वो पानी के झरने,
कहते है हमसे,
इस जहाँ में हम ,
एक कहानी कहते से।
वो कौरवो का धोखा,
औ लाक्षागृह की रात,
अग्नि से बचके,
थोड़े से धस के,
एक सुरंग बनाई,
जो इस गुफा तक थी आई,
आज गुमनामी पाई,
घोर घनेरी हरियाली छाई,
जैसे ही एक बारिश आई,
नदी किनारे,बाग गुफाएं,
और ये हवाएं,
बाद युग बीते,
बौद्ध युग आए,
पाई शरण गुफाओं में,
निशानियां आज भी हवाओं में,
मिलती हर एक फिजाओं में।
कई स्तूप,कई सुरंग,अजीज
चित्रकारी अनुपम लजीज
कई मूर्तियां जीवन्त बोलती,
राज उस पल के वो है खोलती।
एक छोटा सा संग्रहालय,
सजा ग्रामिण नक्काशी से,
एक ही जगह जहाँ,
आज भी पाए,
अण्डे डायनासौर के,
देखो जाकर देखो,
न देखा पछताओगे,
गये तो वही बस जाओगे।
धार जिला, और इस घने जंगल में,
तुम दिल अपना खो जाओगे।
#स्वरचित

शुक्रवार, 2 जून 2017

तस्वीर

समयाभाव में छोटा सा प्रयास स्वीकार करे,सादर नमन

प्रेम तेरा जब देखा खुद में,इक तस्वीर बना ली मैंने।
अब जो भी हो अंजाम,तुझे तकदीर बना ली मैंने।
लाल बिंदियां मस्तक अपने,चूड़ी संग पहन के गहने,
आईना देख निहारु खुद को,पूरी रैन बसा ली मैंने।
#स्वरचित

गुरुवार, 1 जून 2017

हायकू/शर्म

आत्ममंथन
समझे नही कोई
दोषी है सभी।

बहू औ बेटी
नही एक विचार
शर्म की बात।

शर्म गहना
अँखियन पहना
क्या है कहना।

बेचीं आबरू
रक्षक ही भक्षक
बिटियां रोई।

लूटी कलियां
शर्मिंदा खुद माली
पीये ज़हर।

शीशे के घर
मानवता गिरवी
टूटती शर्म।

ये साहूकार
अनजान हस्तियां
दामन मैला।

सर झुकाया
वतन का पतन
ये मेरा देश।

#स्वरचित